
टोक्यो:तिब्बत हाउस जापान और जापान में रह रहे तिब्बती समुदाय ने टोक्यो में आयोजित भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक महोत्सवों में से एक, ‘नमस्ते इंडिया’ में भाग लिया। दो दिवसीय इस महोत्सव में विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। मंच पर भारतीय और जापानी पारंपरिक तथा आधुनिक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए गए, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। महोत्सव में बड़ी संख्या में ऐसे स्टॉल भी लगाए गए थे, जहाँ विभिन्न वस्तुओं, सूचनाओं और सेवाओं के साथ-साथ खाद्य सामग्री भी उपलब्ध थी।
तिब्बत हाउस जापान ने एक स्टॉल लगाया, जिसमें भारत, तिब्बत और जापान से संबंधित जानकारी साझा की गई। स्टॉल पर मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि किस प्रकार बौद्ध धर्म भारत से तिब्बत, चीन और जापान तक पहुँचा। स्टॉल पर बोधिसेन (Bodhisena) की एक विशाल प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई थी। बोधिसेन एक भारतीय संत थे, जो जापान गए थे और वहाँ के लोगों को सीधे बौद्ध धर्म की शिक्षा दी थी।
तिब्बती पहचान, भाषा और धार्मिक संस्कृति के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आयोजित सप्ताह के अंतर्गत स्टॉल पर तिब्बती धार्मिक संस्कृति, बौद्ध दर्शन और तिब्बती लेखन प्रणाली से संबंधित चार्ट भी दर्शकों को दिखाए और समझाए गए।
स्टॉल पर किताबें और हस्तशिल्प की वस्तुएँ रियायती कीमतों पर बेची गईं। इसके अलावा, तिब्बत से संबंधित मुद्दों पर किताबें और सूचना पुस्तिकाएँ निःशुल्क वितरित की गईं।
तिब्बत हाउस जापान के प्रतिनिधि डॉ. त्सेवांग ग्यालपो आर्या ने अपने स्वागत संबोधन में भारतीय संत बोधिसेन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बोधिसेन जापान गए थे और 8वीं शताब्दी में जापान के सम्राट शोमु ने उन्हें नारा शहर स्थित तोडाईजी मंदिर के विशाल बुद्ध प्रतिमा के नेत्रोन्मीलन समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने आगे कहा कि भारत से निकले बौद्ध धर्म से तिब्बत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों को बहुत लाभ हुआ।
प्रतिनिधि आर्या ने महामहिम दलाई लामा के 91वें जन्मदिन का उल्लेख करते हुए उनके अच्छे स्वास्थ्य की जानकारी साझा की। उन्होंने मानवता की एकता तथा विश्व शांति और स्थिरता के लिए वैश्विक समुदाय की भावना को बढ़ावा देने के परम पावन दलाई लामा के संदेश को भी लोगों तक पहुँचाया।
जापान में रहने वाले तिब्बती समुदाय ने कोंगपो दालु तथा “फयुल चोग ला लोग ने द्रो – जेपेई गंगरी कारो” जैसे पारंपरिक तिब्बती गीत और नृत्य प्रस्तुत किए। इस गीत का अर्थ है— “आइए, सुंदर हिमाच्छादित पर्वतों वाली मातृभूमि की ओर वापस चलें।”
तिब्बती समुदाय की इन प्रस्तुतियों को दर्शकों से व्यापक प्रशंसा और सराहना मिली। कई लोगों ने तिब्बती पारंपरिक नृत्यों और रीति-रिवाजों की सुंदरता की प्रशंसा की।
— रिपोर्ट: जापान स्थित तिब्बत कार्यालय










