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तिब्बत समर्थक समूहों के छठे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में श्री लालकृष्ण आडवाणी का भाषण।

November 5, 2010

[शुक्रवार, 5 नवम्बर, 2010 | स्रोत : लालकृष्ण आडवाणी बोलोग]

(सूरजकुंड , हरियाणा , शुक्रवार , 5 नवंबर ,2010) तिब्बत समर्थक समूहों के इस छठे अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के उदघाटन का आमत्रंण पाकर मुझे खुशी हुई है। वास्तव में परमपावन दलाई लामा के साथ एक मंच पर बैठना मेरे लिए एक सम्मान और सौभाग्य की बात है। इस सम्मेलन के आयोजन के लिए मैं तिब्बत समर्थक समूहों को बधाई देता हूं। परमपावन दलाई लामा ने केवल तिब्बत की जनता के आध्यात्मिक नेता है, बल्कि वह दुनिया के एक महान जीवित आध्यात्मिक प्रकाश है। वह बुद्धत्व के महानतम व्याख्याता है। लेकिन उनका बुद्धत्व अकादमिक नहीं बल्कि सजीव है। बुद्ध की तरह ही वह अपनी परेशानी और संघर्ष में अपने दर्शन का पालन करते है। उनकी पीडा जनता की पीडा है। पिछले आधा सदी से ज्यादा समय से वह एक अहिंसक संघर्ष में लगे है जिसमें दृढता , प्रचार और उनका अपना नैतिक व्यक्तित्व ही उनके हथियार है। यह तथ्य ही उनकी महानता को प्रकाट करता है। हम भारत के लोग वास्वत में भाग्यशाली है कि हम परमपावन दलाई लामा और उनकी जनता के संघर्ष में अपना कुछ सहयोग कर पा रहे है। इस तरीके से हम भगवान बुद्ध द्वारा अपने उपर की गई कृतज्ञता रुपी कर्ज का कुछ हिस्सा चुका पा रहे है। अपने लंबे इतिहास में भारत ने कभी भी अपनी सेनाओं को दूसरे देशों पर चढाई करने और एक भारत साम्राज्य स्थापित करने के लिए नहीं भेजा । मैं यहा प्रख्यात उदारवादी चीनी विद्वान और अमेरिका में चीन के राजदूत रह चुके हु शिह (1891- 1962) द्वारा भारतीय सभ्यता के सम्मान में कहे गए शब्दों को उदधृत करना चाहता हूं – ” भारत मे सीमा पार एक सैनिक भेजे बिना भी करीब बीस शताब्दी से तिब्बत पर सांस्कृति रुप से विजय और प्रभाव कायम रखा है। ” भारतीय सभ्यता ने कई सताए हुए समुदायों को शरण दिया है। इनमें पारसी भी शामिल है जिन्हें अपनी मातृभूमि छोडनी पडी थी। वे अपने मातृभूमि लौट नहीं पाए क्योंकि उनके लिए मातृभूमि छोडनी पडी थी। वे अपनी मातृभूमि लौट नहीं पाए क्योंकि उनके लिए मातृभमि ही नहीं बची थी । उनके धर्म की लगभग हर चीज बर्बाद कर दी गई थी और वे फारस में तब ही वापस लौट सकते थे, जब अपने धर्म का पालन करना छोड दें। इस प्रकार उन्हें हमेशा के लिए भारत माता के ममतामयी आंचल को स्वीकार करना पडा। लेकिन तिब्बत की जनता के साथ ऐसा मामला नहीं है। उनके पास अपनी मातृभूमि है जिसे वह बहुत प्यार करते है। वह उनके पूर्वजों की भूमि है। वह उनके बेहतरीन मठों की भूमि है। वह विपुल प्राकृतिक संपदा की भूमि है। वह उनकी पवित्र भूमि है। इसके बावजूद कि उन्होंने तमाम अत्याचारों का सामना किया है और तिब्बत के सांस्कृतिक एंव आध्यात्मिक विरासत को काफी हद तक विनष्ट कर दिया गया है (ऐसे ज्यादातर कार्य चीन के कुख्यात सांस्कृतिक क्रांति के दौरान हुए ) , तिब्बत , तिब्बती जनता का मातृभूमि औऱ पवित्र भूमि बना हुआ है। इसलिए , मैं आशा और प्रार्थना करता हूं कि जल्दी ही एक दिन ऐसा आएगा जब परमपावन दलाई लामा और अन्य तिब्बती लोगों का जबरन निर्वासन खत्म होगा और वे अपनी मातृभूमि एंव पवित्र भूमि में सम्मान एंव गरिमामय तरीके से वापस लौट सकेंगें और इसके बाद तिब्बत के भविष्य का निर्माण करने में सक्षम होंगे। मेरी पार्टी , पहले भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी हमेशा तिब्बती जमता की आंकाक्षा की समर्थक रही है। हम तिब्बती जनता द्वारा चुने हुए विकल्प का सम्मान करते है. जैसा कि परमपावन दलाई लामा ने कहा है कि तिब्बत, चीन जनवादी गणराज्य का एक स्वायत्तशासी क्षेत्र है और वह वास्तविक आजादी नहीं बल्कि वास्तविक स्वायत्तता चाहते है। कम्युनिस्ट चीन यह सोचता है कि परमपावन दलाई लामा और उनके समर्थकों को अपना सम्मानित अतिथि बनाकर भारत उसके आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है। यह धारणा पूरी तरह से गलत है और उन गलतियों की अनदेखी है जो 1949 के बाद बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकारों द्वारा की गई है। भारत के पास चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोई वजह नहीं है। भारत ने कभी भी तिब्बत या चीन को अपनी सीमा में होने का दावा नहीं किया । भारत और चीन एक पडोसी देश है और ऐसी दो प्रचीन सभ्यताएं है जिनमें बहुत कुछ साझा है। दोनों के बीच यह साझा रिशता तिब्बती सभ्यता के माध्यम से बना है। हजारों साल से हमारी यह दो सभ्यताएं तिब्बत के उंचे पर्वतों से जुदा रही है। तिब्बत में दुनिया के एक सबसे अनूठे सभ्यता का जन्म हुआ था। लेकिन अब इतिहास ने भारत और चीन की सीमा को साझा कर दिया है। नई ऐतिहासिक स्थिति में हम यह चाहते है कि तिब्बत, भारत एंव चीन के बीच एक सेतु का काम करे । तिब्बत सभ्यता का जिंदा रहना जो कि सांस्कृतिक एंव राजनीतिक रुप से स्वायत्त हो, वास्तव में चीन में कम्युनिस्ट शासन के खत्म होने के बाद फायदेमंद होगा । वास्तव में ऐसा लगता है कि तिब्बत के मसले को हल करने में सबसे बडी बाधा कम्युनिज्म का विचार और चीन में कम्युनिस्ट शासन ही है। एक लोकतांत्रिक चीन निशिचत रुप से तिब्बत और चीन , दोनों जगह की जनता के लिए अच्छा रहेगा। नवंबर , 2006 में जब चीनी राष्ट्रीपति श्री हू जिनताओ नई दिल्ली आए थे तो उनसे मुलाकात के दौरान मैंने उनके सामने यह उम्मीद जाहिर की थी कि चीन सरकार ऐसी दशा तैयार करेगी जिससे अक्टूबर ,2008 में बीजिंग ओलेंपिक से पहले परमपावन दलाई लामा बीजिंग का दौरा कर सकें। लेकिन चीन ने यह अवसर गवां दिया । हालांकि वह अंतिम अवसर नहीं था। मेरा मानना है कि चीन को गंभीरता से और सही वार्ता करने और तिब्बती जनता कि वाजिब आकांक्षाओं को मान्यता देने के इरादे के साथ परमपावन दलाई लामा से संपर्क करना चाहिए । बीजिंग को बुद्ध के उपदेशों के इस जीवित अवतार से बढिया वाजिब और शांतिप्रिय वार्ताकार नही मिल सकता। जहां तक भारत की बात है, तिब्बत की जनता की आकांक्षाओं को हमारा समर्थन चीन के साथ अनसुलझे सीमा विवाद से अलग है। सीमा विवाद सन 1962 में चीन के आक्रामक हमले के बाद और उलझ गया है। इस युद्व के पहले चीन के प्रति भारत ने जिस तरह का भरोसा और दोस्ती का रिश्ता दिखाया था उसमें धोखा मिलने के बावजूद भारत ने चीन के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कदम उठाए । यहां मैं श्री अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान का खास उल्लेख करना चाहूंगा, जब वह साल 1977 में जनता पार्टि सरकार में विदेश मंत्री थे और 1998 से 2004 के बीच जब वह एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री बने थे। निश्चित रुप से हमारी दूसरी सरकारों ने भी चीन के साथ संबंध सामान्य बनाने और सीमा विवाद को बातची न से हल करने के लिए गंभीरता से प्रयास किया है। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंध 21 वीं सदी में दुनिया का इतिहास तय करने में प्रमुख निर्धारक तत्वों में से एक होगा । भारत और चीन के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान जरुरी है। हालांकि , यदि चीन विरोधी बयान देता रहा, अपने आक्रामक एंव विस्तारवादी इरादे जताता रहा तो यह संभव नहीं होगा। उदाहरण के लिए अरुणाचल प्रदेश पर उसका दावा पूरी तरह से निराधार है । पाकिस्तान द्वारा भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैए को चीन के मौन समर्थन से भारत -चीन संबंध और जटिल हो गए है। मैं आशा करता हूं कि चीनी नेताओं में अच्छाई की भावना बनी रहे। जहां तक सीमा विवाद में भारत के हितों की रक्षा करने की बात है, इसमें पार्टी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। इस बारे में सभी राजनीतिक पार्टियां एक है और आगे भी उन्हें एक बने रहना चाहिए । इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात खत्म करता हूं और यह उम्मीद करता हूं कि यह सम्मेलन पूरी तरह सफल हो। धन्यवाद।


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