
धर्मशाला। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के सिक्योंग पेम्पा शेरिंग ने आठवें अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूह सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। यह सम्मेलन आज १२ मार्च २०२६ की सुबह तिब्बती प्रदर्शन कला संस्थान (टिपा) में शुरू हुआ।
कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज- इंडिया द्वारा आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन को भारत-तिब्बत समन्वय कार्यालय (आईटीसीओ) ने सहयोग किया। इस सम्मेलन में पूरे उपमहाद्वीप से प्रमुख तिब्बत समर्थकों और अधिवक्ताओं को एक मंच पर आमंत्रित किया गया था। उद्घाटन सत्र की शुरुआत मुख्य अतिथि और अन्य गणमान्य व्यक्तियों द्वारा पारंपरिक रूप से घी के दीए जलाकर की गई। मंगलाचरण के बाद उपस्थित प्रतिनिधियों और मेहमानों ने तिब्बती और भारतीय शहीदों के निस्वार्थ बलिदानों का सम्मान करने और उनकी पवित्र स्मृति को याद करने के लिए एक मिनट का मौन रखा।
उद्घाटन समारोह सुबह ९:३० बजे मुख्य अतिथि केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के सिक्योंग पेम्पा शेरिंग और विशेष अतिथि सुरक्षा विभाग की कालोन (मंत्री) डोल्मा ग्यारी की उपस्थिति में शुरू हुआ। दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन में उपस्थित अन्य विशिष्ट मेहमानों में सम्मानित अतिथि हिमाचल प्रदेश के एचपीटीडीसी विभाग के कैबिनेट मंत्री रघुबीर सिंह बाली शामिल थे।
उपस्थित विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों में कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज- इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक श्री आर.के. खिरमे, भारत तिब्बत सहयोग मंच (बीटीएसएम) के राष्ट्रीय महासचिव श्री पंकज गोयल, नई दिल्ली में परम पावन दलाई लामा के ब्यूरो के प्रतिनिधि जिग्मे जुग्ने, भारत-तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आनंद कुमार, कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज- इंडिया के संयुक्त उपाध्यक्ष श्री अरविंद निकोस और अरुणाचल प्रदेश तिब्बत समर्थक समूह के अध्यक्ष श्री तारह तारक शामिल थे।
साथ ही, कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज- इंडिया के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संयोजक तथा क्षेत्रीय समर्थक समूहों के अध्यक्ष और महासचिव भी उपस्थित थे।
समापन के समय श्री आर.के. खिरमे ने इस सभा के दौरान मिले व्यापक समर्थन और स्नेह के लिए लोगों के प्रति गहरा आभार प्रकट किया। उन्होंने धर्मशाला में इस दिन के असाधारण महत्व पर प्रकाश डाला, जहां सदस्यों को परम पावन १४वें दलाई लामा का व्यक्तिगत आशीर्वाद प्राप्त हुआ। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे इस अनुभव से मिली प्रेरणा का उपयोग अपने मनोबल को मजबूत करने और अपने भविष्य के प्रयासों को गति देने के लिए करें। उन्होंने इस अवसर की भावना उनके संबंधित क्षेत्रों और इलाकों में दीर्घकालिक समर्पण सुनिश्चित करने की इच्छा के साथ इस प्रेरणा को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता का आह्वान किया।
अपने समापन भाषण में आर.के. खिरमे ने साझा चुनौतियों और क्षेत्रीय चिंताओं को लेकर दो दिनों तक चले विचार मंथन के सकारात्मक परिणाम निकलने की कामना की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन मुद्दों का सामना निरंतर सहयोग के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए उनके व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद इस महत्वपूर्ण सभा में शामिल होने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया।
आठवें अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूह सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को आगे बढ़ाते हुए विशेष अतिथि सीटीए के सुरक्षा विभाग की कालोन (मंत्री) डोल्मा ग्यारी ने भाषण दिया। इसमें उन्होंने तिब्बती लोकतंत्र के विकास और भारतीय लोगों के निरंतर समर्थन पर विचार व्यक्त किया। उन्होंने परम पावन १४वें दलाई लामा के आजीवन समर्पण को श्रद्धांजलि देकर अपने भाषण की शुरुआत की और परम पावन के दूरदर्शी नेतृत्व तथा एक मजबूत, आधुनिक लोकतंत्र में लाए गए परिवर्तनकारी सुधारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इन सुधारों के कारण तिब्बती मुक्ति साधना में दीर्घकालिक धैर्य और किसी भी स्थिति में डटे रहने की भावना सुनिश्चित हो सकी।
वर्तमान प्रशासन के बारे में बात करते हुए कालोन डोल्मा ग्यारी ने उस वैश्विक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला, जिसके तहत निर्वासित तिब्बती हर पांच साल में अपने नेतृत्व का चुनाव करते हैं। उन्होंने औपचारिक रूप से सिक्योंग पेम्पा शेरिंग के हालिया पुनर्निर्वाचन की प्रशंसा की। इस निर्वाचन में श्री शेरिंग को साठ प्रतिशत से अधिक वोट मिले। उन्होंने कहा कि यह जनादेश एक नई जिम्मेदारी और आंदोलन की रणनीतिक दिशा में निरंतरता की उम्मीद लेकर आया है। उन्होंने पिछले दिन आयोजित ‘तेनशुग (दीर्घायु प्रार्थना)’ के लिए भी गहरी सराहना व्यक्त की और परम पावन द्वारा उपस्थित लोगों को दिए गए व्यक्तिगत आशीर्वाद लेने वालों के साथ ही उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होंने दूर से अपना समर्थन दिया। इस क्रम में उन्होंने विशेष रूप से सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों का जिक्र किया।
मार्च महीने के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए सुरक्षा कालोन ने १९५९ के राष्ट्रीय जनक्रांति और उन गंभीर परिस्थितियों का वर्णन किया, जिनके कारण तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परम पावन को भारत में शरण लेनी पड़ी थी। उन्होंने भारत सरकार और भारत की जनता के प्रति ६७ वर्षों के आतिथ्य के लिए गहरा आभार व्यक्त किया, जिसने तिब्बती शरणार्थियों को अपने जीवन और संस्कृति को फिर से संवारने का अवसर दिया। कोलकाता (पूर्व में कलकत्ता) में आयोजित १९५९ के ‘अखिल भारतीय तिब्बत सम्मेलन’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रतिनिधियों को याद दिलाया कि शुरुआती भारतीय नेताओं के प्रस्ताव आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं और वे दोनों राष्ट्रों के बीच निरंतर एकजुटता की नींव के रूप में कार्य करते हैं।
उन्होंने अपने संबोधन का समापन करते हुए इस बात को पुनः दोहराया कि तिब्बती लोगों की आशाएं और आकांक्षाएं परम पावन दलाई लामा के दीर्घायु होने और उनकी सुरक्षा पर ही केंद्रित हैं। उन्होंने ‘तिब्बत समर्थक समूहों’ के सदस्यों से आग्रह किया कि वे १९५९ के प्रस्तावों की गति को बनाए रखें और यह सुनिश्चित करें कि तिब्बत के लिए भारतीय समर्थन की हमारी विरासत बनी रहे तथा क्षेत्रीय स्थिरता और मानवाधिकारों की प्राप्ति के मार्ग में यह हमारे उत्साह को बनाए रखे।
सभा को संबोधित करते हुए सिक्योंग पेन्पा शेरिंग ने कहा कि तिब्बती नेतृत्व पर दो प्रमुख जिम्मेदारियां हैं- चीन-तिब्बत संघर्ष का समाधान करना और निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के कल्याण को सुनिश्चित करना। उन्होंने उल्लेख किया कि तिब्बती प्रशासन निर्वासन में रहते हुए भी एक अद्वितीय और पूर्ण रूप से क्रियाशील लोकतांत्रिक प्रणाली है, जिसे १९६० के दशक की शुरुआत से लेकर अब तक के छह दशकों से भी अधिक समय में परम पावन के मार्गदर्शन में धीरे-धीरे विकसित किया गया है। सिक्योंग ने आगे कहा कि तिब्बती लोग वर्तमान में भारत के ३७ से अधिक स्थानों पर, विशेष रूप से कर्नाटक तथा नेपाल के कई इलाकों में फैले हुए हैं। ऐसे में समुदाय का कल्याण सुनिश्चित करना प्रशासन की एक प्रमुख जिम्मेदारी बन जाती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिब्बत के समर्थन को लेकर सिक्योंग ने अमेरिका के साथ हासिल की गई प्रगति पर प्रकाश डाला, जहां एक ऐसा कानून पारित किया गया है जो तिब्बत की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के रूप में मान्यता देता है और उसका समाधान भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप उचित मानता है। उन्होंने कहा कि यह कानून तिब्बती लोगों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ को भी मान्यता देता है, जो संयुक्त राष्ट्र के १९६१ के प्रस्तावों के अनुरूप है। साथ ही यह अमेरिकी कानून चीन के इस दावे को खारिज करता है कि तिब्बत प्राचीन काल से ही चीन का हिस्सा रहा है। यह कानून तिब्बत को उसके ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप में उसकी संपूर्णता के साथ मान्यता देता है, जिसमें खाम और आमदो जैसे पारंपरिक प्रांत भी शामिल हैं। यह केवल वर्तमान के ‘तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र’ की सीमा को ही तिब्बत नहीं मानता है।
तिब्बती समुदाय के कल्याण के संबंध में उन्होंने बताया कि निर्वासन में रह रहे तिब्बती भारत में ३६ से ज्यादा जगहों पर फैले हुए हैं। इनमें पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा तिब्बती बस्तियां कर्नाटक में हैं। उन्होंने आगे कहा कि कई तिब्बती समुदाय नेपाल में भी हैं। इस तरह व्यापक क्षेत्र में फैली हुई तिब्बती आबादी का कल्याण और प्रशासन निर्वासित तिब्बती नेतृत्व की अहम जिम्मे दारी बन जाती है।
सिक्योंग ने परम पावन दलाई लामा के अगले अवतारों के बारे में भी बात की और दोहराया कि यह फैसला तिब्बती लोगों को ही करना है। उन्होंने कहा कि तिब्बती समुदाय ने गादेन फोडरंग संस्था को जारी रखने की इच्छा जाहिर की है और एकमात्र दलाई लामा के गादेन फोडरंग ट्रस्ट के पास ही अगले दलाई लामा को चिह्नित करने का अधिकार है। किंग राजवंश के दौरान शुरू किए गए तथाकथित ‘गोल्डन अर्न सिस्टम’ के जरिए इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने की चीन के दुष्प्रयास के बारे में उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक सबूत बताते हैं कि १८वीं सदी से बहुत पहले पारंपरिक तिब्बती धार्मिक प्रक्रिया के तहत ही पूर्व के दलाई लामाओं को पहचाना जाता था। अपनी बात खत्म करते हुए सिक्योंग पेन्पा शेरिंग ने परम पावन के इस बयान को फिर से दोहराया कि उनका एक आजाद दुनिया में पुनर्जन्म होगा और इस बात पर जोर दिया कि पुनर्जन्म की वैधता तिब्बती लोगों के पास है और किसी दूसरे देश को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है।
अपने मुख्य भाषण के दौरान उन्होंने तिब्बती लोगों के साथ-साथ कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज के साथ उनके अटूट समर्थन और लगातार एकजुटता के लिए भारत की केंद्र और राज्य सरकारों के प्रति बहुत-बहुत आभार प्रकट किया।
उद्घाटन समारोह के ‘मास्टर ऑफ द सेरेमनी कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन्स’ के क्षेत्रीय समन्वयक श्री पंकज गोयल ने समन्वय किया और धन्यवाद प्रस्ताव राष्ट्रीय सह-समन्वयक श्री अरविंद निकोसे ने पेश किया।
इस सम्मेलन में तिब्बती मुद्दे के लिए भारतीय जमीनी स्तर के आंदोलन पर चर्चा करने और उसे मजबूत करने के लिए भारत भर से अलग-अलग तिब्बत समर्थक समूहों के अध्यक्ष और सदस्यों समेत २०० से ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

















