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१३वीं तवांग तीर्थयात्रा देशभक्ति पूर्ण भव्यता के साथ रवाना

November 23, 2024


गुवाहाटी।
‘तिरंगा फार कैलाश मानसरोवर’ नारे के साथ १३वीं तवांग तीर्थयात्रा को १९ नवंबर २०२४ को गुवाहाटी के श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। भारत-तिब्बत सहयोग मंच (बीटीएसएम) के असम प्रांतीय इकाई द्वारा आयोजित यह समारोह भारत और तिब्बत की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक रहे तीर्थयात्राओं के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और बीटीएसएम के संरक्षक श्री इंद्रेश कुमार की अहम उपस्थिति रही। इंद्रेश कुमार ने २० नवंबर २०२४ को आधिकारिक रूप से यात्रा को हरी झंडी दिखाई। भारत के २३ राज्यों के लगभग २७५ उत्साही प्रतिभागियों को लेकर तवांग तक की सप्ताह भर की यात्रा रवाना हुई। प्रतिभागियों का यह उत्साह तिब्बती मुद्दे का समर्थन करने के लिए भारतीय लोगों की सामूहिक इच्छा को दर्शाता है।

यात्रा के उद्घाटन समारोह की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई, इसके बाद प्रतिष्ठित बिहू नृत्य सहित अनेक प्रकार के जीवंत असमिया सांस्कृतिक प्रदर्शन हुए। पारंपरिक असमिया संगीत वाद्ययंत्रों के साथ लछितर अहबन के भावनात्मक प्रस्तुतीकरण ने देशभक्ति का समां बांध दिया। सत्र की अध्यक्षता भारत-तिब्बत सहयोग मंच के संरक्षक श्री इंद्रेश कुमार, तिब्बती सांसद श्रीमती शेरिंग डोल्मा, भाजपा के सम्मे और त्रिपुरा के सचिव रवींद्र राजी जी,  बीटीएसएम असम के अध्यक्ष अहरी कैलाश सरमा, बीटीएसएम के कार्यकारी राष्ट्रीय उर्वशी महंत, अमेरिका में विश्व प्रसिद्ध चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ. बिकुल दास, अरुणाचल प्रदेश से पूर्व सांसद श्री रिनचेन खांडो खिरमे, बीटीएसएम के  असम प्रांत के महासचिव डॉ. बिचन कुमार सिंघा और तिब्बती युवा कांग्रेस के अध्यक्ष गोन्पो धोंडुप ने की।

समारोह के दौरान, तिब्बती संसद सदस्य श्रीमती शेरिंग डोल्मा ने श्री इंद्रेश कुमार को परम पावन १४वें दलाई लामा की आत्मकथा का का हिंदी संस्करण ‘मेरा देश, मेरे देशवासी’ भेंट किया। समारोह में प्रस्तुति आईटीसीओ, डीआईआईआर, सीटीए की समन्वयक ताशी देकि ने किया।

तिब्बती संसद सदस्य श्रीमती शेरिंग डोल्मा ने सभा को संबोधित करते हुए सीसीपी शासन के तहत तिब्बतियों की दुर्दशा पर भावुकता से प्रकाश डालते हुए कहा, ‘सीसीपी की औपनिवेशिक शैली के आवासीय विद्यालय नीति का उद्देश्य तिब्बतियों को अपने में आत्मसात कर लेना है। मैं भारत सरकार से तिब्बतियों की आवाज़ बनने की अपील करती हूं। भारत-तिब्बत सीमा एक तथ्य है और तिब्बत संघर्ष आंतरिक रूप से भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ है। तिब्बत संघर्ष के समाधान के बाद भारत और तिब्बत के बीच सच्चा भाईचारा होगा।’

उन्होंने आगे तिब्बत मुद्दे को तत्काल हल करने की अनिवार्यता पर जोर दिया क्योंकि परम पावन १४वें दलाई लामा अपने ९०वें जन्मदिन के करीब पहुंच रहे हैं।

बीटीएसएम के राष्ट्रीय महासचिव श्री पंकज गोयल ने बीटीएसएम की २५ वर्षों की यात्रा के बारे में बात की। उन्होंने कहा, ‘बीटीएसएम ने तिब्बत की आवाज को वैश्विक स्तर पर एकजुट करने और बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया है। हम सभी से चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने का आग्रह करते हैं – न केवल उन्हें खरीदने से इनकार करें, बल्कि उनकी बिक्री को भी रोकें। यह यात्रा केवल ३०० यात्रियों की आवाज नहीं है। जब हम कहते हैं, ‘चीन की सीमा चीनी दीवार, बाकी सब कब्ज़ा है’ तो यह १.४५ अरब भारतीयों की आवाज बनकर निकलती है।’

अरुणाचल प्रदेश से पूर्व सांसद श्री रिनचेन खांडो खिरमे ने भारत के साथ तिब्बत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘भारतीय संसद में १९६२ के प्रस्ताव ने सीसीपी द्वारा तिब्बत पर अवैध कब्जे को हल करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को मान्यता दी। १९६० में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कलकत्ता में तिब्बत सम्मेलन हुआ, जिसमें भारत ने तिब्बत पर बातचीत की शुरुआत की। दुर्भाग्य से पंचशील समझौते के बाद जब चीन १९६२ के युद्ध की तैयारी कर रहा था, भारत को इस बात की जानकारी नहीं थी।’

श्री इंद्रेश कुमार ने अपने संबोधन में बीटीएसएम के मिशन को  उजागर करते हुए कहा, ‘बीटीएसएम की शुरुआत ‘तिब्बत की आजादी’ के नारे के साथ हुई थी। जब चीन के वैश्विक प्रभुत्व के बारे में पूछा जाता है तो मैंने एक पुरानी कहानी सुनाता हूं कि ‘एक चींटी हाथी के कान में घुस गई और हाथी मर गया।’ सत्य, चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, किसी भी चुनौती से पार पा सकता है। तवांग यात्रा उस सत्य का प्रतिनिधित्व करती है।’

उन्होंने २५ साल पहले धर्मशाला की अपनी यात्रा को भी याद किया, जहां उन्होंने तिब्बती आंदोलन की प्रामाणिकता देखी और पुष्टि की कि पवित्र कैलाश मानसरोवर बिना पासपोर्ट के सभी के लिए सुलभ होना चाहिए।

यात्रा गुवाहाटी से शुरू हुई और तवांग पहुंचने से पहले मोंगलदाई, रोता, बोमडिला और सेला दर्रे से गुजरेगी। १३वीं तवांग तीर्थयात्रा २०२४ तिब्बत के लिए भारत के स्थायी समर्थन और क्षेत्र में शांति और न्याय को बढ़ावा देने की उसकी प्रतिबद्धता का एक शक्तिशाली बयान है।


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