
धर्मशाला। परम पावन दलाई लामा ने अपने ९०वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित हो रहे समारोहों के तहत ११ मार्च, २०२६ की सुबह अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूहों द्वारा उनकी दीर्घायु के लिए की गई प्रार्थनाओं में भाग लिया। उनके निवास के द्वार पर ‘कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज-इंडिया’ के प्रतिनिधियों द्वारा उनका स्वागत किया गया और फिर वे मंदिर के प्रांगण में ऊंचे पर स्थापित अपने सिंहासन पर विराजमान होने के लिए आगे बढ़े।
शुरुआत में, अरुणाचल प्रदेश के रूपा और कलाकतंग से आए गृहस्थ साधकों के एक समूह ने ‘छोड’ साधना से संबंधित एक अनुष्ठान किया। उन्होंने अपनी रस्म का समापन परम पावन की दीर्घायु के लिए एक ही श्लोक में की गई प्रार्थना के साथ किया।
तिब्बत के दिव्य लोक में, जो बर्फीले पहाड़ों की शृंखला से घिरा है,
सभी प्राणियों के लिए समस्त सुखों और सहायता का स्रोत
स्वयं तेनजिन ग्यात्सो-साक्षात चेनरेजिग हैं,
कामना है कि उनका जीवन युगों- युगों तक सुरक्षित रहे!
इसके बाद चाय और खीर का प्रसाद अभिमंत्रित कर उपस्थित जनसमूह में वितरित किया गया।
जब नामग्याल मठ के भिक्षुओं ने श्लोकों का पाठ कर लिया, तब कोर ग्रुप के संयोजक और तिब्बत समर्थक समूहों के दो वरिष्ठ सदस्यों ने परम पावन को एक ‘मंडल’ तथा बुद्ध के मन, वचन और कर्म के प्रतीक अर्पित किए।
इसके बाद परम पावन दलाई लामा के दो गुरुओं द्वारा रचित ‘परम पावन दलाई लामा की दीर्घायु के लिए विस्तृत प्रार्थना- अमरता का गीत’ का गायन सर्वप्रथम हिंदी में (जिसका नेतृत्व कैलाश चंद्र बौद्ध ने किया) तत्पश्चात तिब्बती भाषा में किया गया। इस अवसर पर परम पावन को तिब्बती और भारतीय ध्वज भी भेंट किए गए। कोर ग्रुप के कार्यकारी सदस्यों ने परम पावन के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुए उन्हें खटक अर्थात् रेशमी दुपट्टे अर्पित किए।
‘कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज- इंडिया’ के राष्ट्रीय संयोजक श्री आर. के. खिरमे ने सभा को संबोधित करते हुए इस बात का उल्लेख किया कि किस प्रकार परम पावन लंबे समय से कोर ग्रुप के सदस्यों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहे हैं। उन्होंने तथा अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूहों के वरिष्ठ सदस्यों ने मिलकर एक ‘तेनशुक स्मारिका’ का विमोचन भी किया। इसके बाद, उन्होंने परम पावन को ‘करुणा रत्न’, यानी करुणा का एक रत्न-भेंट किया, इसमें सोने का बना एक बोधि-पत्र था, जिसकी एक ओर ‘धर्म चक्र’ और दूसरी ओर ‘शिक्षण मुद्रा’ में एक हाथ बना हुआ था। समारोह के संचालक ने इस पर अंकित शब्द पढ़कर सुनाए:-
भारत में तिब्बत समर्थक समूहों द्वारा १४वें दलाई लामा- तेनजिन ग्यात्सो को विश्व शांति, करुणा और भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत को बढ़ावा देने में उनके आजीवन समर्पण की पहचान के रूप में अत्यंत श्रद्धापूर्वक ‘करुणा रत्न’ अर्पित किया जाता है।
हम परम पावन के ‘चार महान प्रतिबद्धताओं’ की पूर्ति और तिब्बत की स्वतंत्रता को पुन: हासिल करने के उनके प्रयासों के प्रति अपने अडिग समर्थन को पुनः दोहराते हैं।
अरुणाचल प्रदेश की महिलाओं के एक समूह ने एक प्रस्तुति में गीत गाए और नृत्य किया, इस प्रस्तुति में राज्य की छह प्रमुख जनजातियों की लोक परंपराओं, वेशभूषा आदि को विशेष रूप से दर्शाया गया था। इसके बाद तमिलनाडु के कलाकारों द्वारा देवी काली को समर्पित एक शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसने दक्षिण भारतीय नृत्य शैलियों की ‘कथा-वाचन’ भूमिका को बखूबी प्रदर्शित किया।
तत्पश्चात, अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूहों के ४०० से अधिक सदस्यों को परम पावन के समक्ष से गुजरते हुए उन्हें अपना सम्मान अर्पित करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान नामग्याल मठ के भिक्षुगण ‘सत्य के शब्दों की प्रार्थना’ का पाठ कर रहे थे।
धर्मशाला स्थित ‘भारत-तिब्बत मैत्री संघ’ के अध्यक्ष अजीत नेहरिया द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किए जाने के उपरांत, परम पावन अपने आसन से नीचे उतरे, एक गोल्फ-कार्ट में सवार हुए और धीरे-धीरे अपने निवास की ओर प्रस्थान कर गए, इस दौरान वे मार्ग में उपस्थित अपने शुभचिंतकों की ओर देखकर मुस्कुराते रहे और हाथ हिलाकर उनका अभिवादन स्वीकार करते रहे।








