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तिब्बत की मिट्टी में बिहारी संस्कृति की सुगंध

August 20, 2012

दैनिक जागरण, 20 अगस्त, 2012

मुक्ति के लिए अनुरोध को अनसुना कर रही चीन की सरकार

हमारे संवाददाता, पटना : तिब्बत को चीन के कब्जे से मुक्त कराने के लिए हमने अहिंसा का रास्ता चुना है। बापू की तरह। हमारे लोकतंत्र में भी बाबा भीम राव अम्बेडर की सोच है। बौद्ध धर्म में आस्था रखने के कारण तिब्बत की मिट्टी में बिहार की संस्कृति की सुगंध है। मेरा जन्म दार्जिलिंग में हुआ इसलिए मैं भी मेड इन इंडिया हूं। उक्त बातें रविवार को बीआइए के सभागार में तिब्बत की निर्वासित सरकार के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री डा. लोबसांग सांगेय ने कहीं।

सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से प्रधानमंत्री के सम्मान में नागरिक अभिनंदन समारोह के मौके पर -भावी विश्व भू-राजनीति में स्वतंत्र तिब्बत की भूमिका, विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी। डा. सांगेय ने इसे संबोधित करते हुए कहा कि तिब्बत को मुक्त करने के लिए चीन से धर्मगुरू दलाईलामा 60 वर्षो से अनुरोध कर रहे हैं लेकिन इसे अनसुना किया जा रहा है। कैलाश मान सरोवर पर भी उसने कब्जा कर लिया है। वहां जाने के लिए भारतीयों को वीजा लेना पड़ता है। चीन तिब्बत के संसाधनों को लूट रहा है। 10 बड़ी नदियां तिब्बत से निकलकर कई देशों में बहती हैं। चीन ने तिब्बत को मिलिट्रीराइज्ड कर दिया है। रेल, हवाई और जल संसाधनों के जरिए वह भारत के करीब पहुंचना चाहता है। इसलिए तिब्बत की सुरक्षा में ही भारत की सुरक्षा छिपी है। विश्वास है कि चीन को हम उसके मकसद में कामयाब नहीं होने देंगे। 14वें धर्मगुरू दलाईलामा एक दिन तिब्बत की राजधानी ल्हासा जरूर जाएंगे। इतिहास बदलता है। हमारा भी वक्त आएगा और तब आपको कैलाश मान सरोवर जाने के लिए वीजा की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मौके पर विशेष अतिथि पूर्व सांसद विजय कृष्ण ने कहा कि हम तिब्बत की लड़ाई को अपनी लड़ाई मानते हैं। तिब्बती शरणार्थी नहीं, हमारे शरीर के अंग हैं। सांस्कृतिक गौरव संस्थान के अध्यक्ष प्रो. डा. देवेन्द्र प्रसाद सिंह, कार्यकारी प्रधान डा. महेश चंद्र, प्रख्यात विचारक इंद्रेश कुमार, डा. श्रीमती उषा शर्मा, समाजवादी सुंदर लाल सुमन, सेवा निवृत न्यायमूर्ति गजेन्द्र प्रसाद सहित अन्य वक्ताओं ने अपनी बात रखी।


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