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तिब्बती जान से ज्यादा देश का महत्व समझें

September 30, 2012

राकेश पठानिया, धर्मशाला

जागरण, 29 सितम्बर, 2012

पिछले चार दिन से विशेष आमसभा की बैठक में तिब्बत में आत्मदाह रोकने और स्थिति सामान्य बनाने के लिए हुए मंथन के बाद यह बात प्रमुखता से उठी कि तिब्बतियों को अपनी जान से ज्यादा देश का महत्व समझना होगा। वह आत्मदाह की बजाय देश की आजादी के लिए प्रयास करें। बैठक में तिब्बत की स्थिति से निपटने के लिए तीन मुख्य बिंदु रखे गए थे कि तिब्बती सरकार व लोग क्या कर सकते हैं? दूसरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कैसे दबाव बनाया जाए और तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु था कि भारत व एशिया की अहम भूमिका का सहयोग कैसे लिया जाए? 26 देशों के 438 प्रतिनिधियों ने इन बिंदुओं पर मंथन कर अपनी रिपोर्ट संसदीय समिति को शुक्रवार को सौंपी। निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोबसांग सांग्ये के अनुसार, मिले सुझावों में यह भी महत्वपूर्ण है कि चीन की दमनकारी नीतियों को बर्दाश्त करने की बजाय इनका डटकर मुकाबला करना होगा और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक फोरम बनाने का सुझाव आया है ताकि विश्व स्तर पर तिब्बत की समस्या को हाइलाइट किया जा सके। विश्व समुदाय को तिब्बत की वास्तविक स्थिति की जानकारी के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के गठन के लिए बाध्य किया जा सके। तिब्बत मसले के समाधान को विशेष दूतों की नियुक्ति को भी आवश्यक बताया गया और काशाग यानी तिब्बती संसद से आग्रह किया गया है कि इनकी नियुक्ति शीघ्र हो ताकि चीन सरकार से वार्ता का दौर शुरूहो सके।

तिब्बती संसद के अध्यक्ष पेंपा शीरिंग ने जानकारी दी है कि तिब्बत में पहले ही जनसंख्या कम है, इसलिए एक भी जान जाना तिब्बत के लिए हानिकारक है। इसलिए सुझाव आया है कि तिब्बतियों को जान का महत्व समझाया जाए, ताकि वह जान गंवाने की बजाय तिब्बत की रक्षा की ओर अधिक ध्यान दें।

निर्वासित सरकार के प्रवक्ता पी. अतिशा के अनुसार, सुझावों में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है। विभिन्न समितियों ने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया है कि तिब्बत के मसले को हल करवाने के लिए भारत और एशिया के देश अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए तिब्बत के मसले को लेकर भारत के लोगों सहित सांसदों, विधायकों व अन्य जन प्रतिनिधियों से लगातार बैठकें करनी होंगी और उन्हें इस समस्या के प्रति जागरूक कर तिब्बत के मामले को सुलझाने के लिए एक जन आंदोलन के लिए प्रेरित करना होगा। वहीं, एशिया के देशों पर भी यह दबाव बनाना होगा कि ताकि वे संयुक्त राष्ट्र संघ को तिब्बत की समस्या के हल के लिए बाध्य कर सकें।

वहीं, तिब्बत यूथ कांग्रेस के प्रधान सेवांग बताते हैं कि युवा वर्ग को भी समितियों ने सुझाव दिया है कि वह अपनी संस्कृति के संरक्षण में विशेष योगदान देने के लिए पाश्चात्य की बजाय तिब्बती परिधानों का प्रयोग करें। इस चार दिवसीय बैठक के समापन के बाद प्रतिनिधियों ने परमपावन दलाईलामा की दीर्घायु की कामना की।


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