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अपने धर्म में आस्था रखें और दूसरे धर्मका भी करें सम्मान । दलाई लामा

January 14, 2011

तिब्बतियों के धर्मगुरु परम पावन दलाई लामा ने कहा कि हमारा कर्तव्य होना चाहिये कि हम अपने धर्म के प्रति आस्था रखते हुए दूसरे धर्माकों भी सम्मान दें। क्योंकि संसार के सभी धर्म स्वस्थ दृष्टि रखतें है । सभी धर्म करुणा , दया , प्रेम , अहिंसा आदि मानवीय गुणोंको अपने में समाहित किये हुए है ।
केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्व विधालय के कालच्रक प्रांगण में आयोजित व्याख्यान के दूसरे दिन गुरुवार को प्रथम सत्र में परम पावन दलाई लामा प्रवचन कर रहे थे । उन्होंने धर्म को मानने वाले लोगों की प्रशंसा करते हुए कहाकि ऐसे धर्मावलंबी जो निरंतर परोपकार हेतु प्रयासरत रहते है, वे बधाई के पात्र है, ऐसे लोग उन लोगों की तुलना में अधिक सुखी होते है जो धर्म को नहीं मानते ।
उदाहरण के तौर पर परम पावन दलाई लामा जीने महात्मा गांधी का द्रष्टान देते हुए कहा कि वे धर्म में बहुत आस्था रखते थे और दीन -हीनों के प्रति सदाव रखते हुए एक फकीर के रुप में सत्य अहिंसा के बल पर भारत को आजादी दिलवायी। उन्होंने माकर्सवाद के आर्थिक सिद्धान्त की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी समता मूलक दृष्टि गृहण करने योग्य है । भिक्षुसंघ , माकर्सवाद के आर्थिक सिद्धान्त और मानवता वादी दृष्टि जानने का प्रयास करें।
उन्होंने बौद्ध एंव बौद्ध सम्प्रदायों के अनुयायियों को सलाह दी कि वे राग- द्वेष एंव अहंकार से परे होकर निरंतर कुशल (सत) कर्म करें ।
परम पावन जीने मृत्यु औऱ उसकी ध्रुव सत्यता पर कहा कि मृत्यु बडी विश्वासघाती है । वह यह नहीं देखती कि कौन पुण्यात्मा है और कौन पापी है। वह किसी को भी नहीं छोडती । इसलिए हमें चाहिए कि समय रहते कुशल करते रहे, क्योंकि यह मानवजीवन दुर्लभ है। दुर्लभ ही नहीं , अपितु यह पुन नही मिलता । अत हम कुशल कर्म करके अपने इस जीवन को सार्थक कर लें परम पावन ने सलाह दी कि मुनष्य को शत्रुता से दूर रहना चाहिए , क्योंकि यह दूसरों का ही नुकसान नही करती , अपितु अपने को भी कष्ट देती है । इतना ही नहीं यदि अपने शत्रुओं में कुछ गुण है तो उन्हें अवश्य ग्रहण करना चाहिए ।
बोधिचित के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि बोधि चित्त उत्पन्न होने पर ही मनुष्य प्रज्ञावान होता है और अपने को निरन्तर परोपकार में लिप्त रखता है ।
प्रज्ञा एक अनमोल रत्न है जो बोधिचित्त होने पर हमें मिलती है । अत धन -दौलत , कीमती आभूषणों के प्रति मोह त्याग कर हमें अपनी प्रज्ञारुपी रत्न की रक्षा करनी चाहिए । पैसा दुख का कारण है । अत आवश्यकता से अधिक धन संग्रह नही करना चाहिए और यदि अधिक धन है तो उसे गरीबों के लिए विधालय , अस्पताल , धर्मशाला अदि जनकल्याणकारी योजनाओं मे खर्च कर देना चाहिए । धन की सार्थकता इसी में है । परम पावन जी ने शादी विवाह में दहेज लेने देने वाले लोगों की निन्दा की और जीवन को सहज ढंग से जीने की सलाह दी ।
व्याख्यान के दूसरे सत्र में परम पावन दलाई लामा ने कहा कि मनुष्य को प्रतिशोध की भावना से दूर रहना चाहिए । दुर्जनों के बीच रहकर भी अपने गुणों की रक्षा करनी चाहिए । सब कुछ नष्ट हो जाये पर चित्त की रक्षा यथा सम्भव करें । बौद्ध भिक्षु एंव सामान्य लोग अपने वरिष्ठ लोगों के प्रति श्रद्धा भाव रखें।
उन्होंने भारत में बौद्ध धर्म के पतन के कारणों में उपास को या भिक्षुओं द्वारा धर्म को ठीक तरह से न समझ पाना, धर्म के विपरीत आचरण करना औऱ धन के प्रति आसक्ति रखना, अत्यधिक सक्रिय रहना बताया । उन्होंने सलाह दी कि धर्म की रक्षा के लिए बौद्ध भिक्षुओं को धनसंग्रह से बचना चाहिए । धन के प्रति मोह भिक्षुओं को पतनोन्मुख कर सकता है ।


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