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पंडित दीनदयाल उपाध्याय

October 8, 2010

तिब्बत पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार
तिब्बत की स्वतंत्रता में भारत का योगदान
यह अनिवार्य रूप से शांतिपूर्ण तिब्बती जनता के प्रति हमारी चिंता और साम्यवादियों ने जिस प्रकार का व्यवहार किया उसके प्रति हमारी नाराजगी ही है कि इस मामले में तिब्बतियों के प्रति लोगों की इतनी गहरी सहानूभूति है। यह भी हो सकता है कि हमारी अपनी रक्षा और सुरक्षा के प्रति उत्पन्न खतरे के प्रति बढ़ते बोध से लोग हजार बार यह सोचने को मजबूर हुए हों कि जो लोग पीड़ित हुए हैं वह हमसे अंतरंग रूप से जुडे हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि लोग व्यग्रता से इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि दलाई लामा और भारत सरकार आगे क्या कदम उठाती है। रइस मामले में भारत को बहुत नाजुक स्थित का सामना करना पड़ रहा है। चीन एक मित्र देश है। भारत व चीन पहले भी मित्र रहे हैं और भविष्य में भी मित्र रहना चाहेंगे।
तिब्बत एक ऐसा मामला है जिसमें भारत अपना हित दांव पर लगाकर ही परोपकारिता कर सकता है। चीन ने तिब्बत की स्वायत्तता बनाये रखने का वचन दिया है- संभवतः पंडित नेहरू को कुछ क्षमायाचना जैसा भाव प्रदान करने के लिए ताकि एक विच्चाल डै्रगन के आगे एक महान उद्देशय के अधम समर्पण के बारे में उनकी अंतर्आत्मा की आवाज दब जाए। लेकिन सरकार द्वारा परिणीत एकाधिकारवादी तरीके से बहुत अधिक समय तक लोगों को बहलाया नहीं जा सकता। जब चीनी लोगों ने सभी क्षेत्रों में अपने तथाकथित सुधारों’ को लागू किया तभी तिब्बत की स्वायत्तता अपने आप खंडित हो गयी। एक अत्यंत धार्मिक व आध्यात्मिक लोग विदेशी रीति-रिवाजों वाले अत्यधिक भौतिकवादी लोगों के साथ कैसे रह सकते है।
एक धार्मिक प्रमुख के नाते वह अपना कार्य जारी रख सकते हैं लेकिन क्या उनकी लक्ष्य की पूर्ति के लिए यह पर्याप्त होगा। यह सच्चाई है कि भारत भूमि पर सिर्फ अपनी मौजूदगी के द्वारा ही दलाई लामा तिब्बती योद्धाओं को नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं, जो आक्रमणकारी सेना के शक्तिच्चाली होने के बावजूद अपने देश की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण संभवतः सक्रिय रहेंगे।
इस मामले में भारत की भी कुछ बाजी लगी हुई है। तिब्बत की स्वायत्तता हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि हम इसकी रक्षा नहीं कर सके तो न केवल हमारी स्वतंत्रता व अखंडता खतरे में पड़ जाएगी , बल्कि हमारे लिए गुटनिरपेक्षता की नीति को जारी रखना भी लगभग असंभव हो जाएगा। जहां तक चीन की नीयत का प्रच्च्न है वह बिल्कुल स्पष्ट है। चीन पहले ही मानचित्रीय आक्रमण’ कर चुका है। अब यह बात सामने आ रही है कि चाउ-एन-लाई ने एक नया सुझाव दिया है कि चीन व अन्य एशियाई देशो के बीच अनिर्धारित सीमा को शांतिपूर्ण बातचीत के द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि चीन, भारत व तिब्बत को विभाजित करने वाली मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता।
चीन, भारत के अलावा नेपाल, भूटान व सिक्किम पर भी बुरी नजर रखता है। एक स्वतंत्र देश के रूप में नेपाल अपनी सुरक्षा के लिए खुद जिम्मेदार है। लेकिन तिब्बत में साम्यवादी चीन की गतिविधियों से नेपाल के शासकों के सामने अपने देश की भविष्य में सुरक्षा का गंभीर प्रशन खड़ा हो गया है।
तिब्बत की स्वायत्तता के प्रशन केवल एक मजबूत और निश्चित नजरिया ही चीन को सही ठहरा सकता है। दोनों देशो के बीच मित्रता बनाये रखने के लिए इस प्रकार का नजरिया जरूरी है। यह मित्रता भरोसा व सम्मान, बराबरी व पारस्परिक लाभ पर आधारित होना चाहिए न कि डर व गलतफहमी के आधार पर। किसी के नजरिये में अंतर खोजने से बचना चाहिए और किसी भी मसले का खुला समाधान होना चाहिए।
इसलिए दलाई लामा को सभी तरह की सुविधाएं देनी चाहिए ताकि वह संघर्षरत तिब्बती लोगों को दिशा प्रदान कर सकें। भारत के लोग यही चाहते हैं और भारत का हित भी इसी में है।


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