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जल संसाधन का राजनीतिकरण (दूसरा भाग)

March 4, 2020

इकराम सहगल

dailytimes.com

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में, विशेष रूप से तेजी से बढ़ रही जनसंख्या और दुनिया भर में व्यापक शहरीकरण के प्रकाश में, ताजा जल संसाधनों की मांग में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और संसाधन की कमी के कारण और अधिक तनाव व खिंचाव हो जाता है। समाजों की ओर से अपने जल संकट के प्रभावी और स्थायी समाधान खोजने के लिए तेजी से दबाव डाला जाता है।

दक्षिण एशिया में पानी की कमी विशेष रूप से एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दा बन गया है, जो दुनिया के सबसे अधिक गतिशील क्षेत्रों में से एक है और यहां दुनिया की लगभग एक चैथाई आबादी बसती है। दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप की उत्तरी सीमा मध्य एशिया है जो काराकोरम, हिंदुकुश और हिमालय जैसी कई उच्च पर्वत श्रृंखलाओं से विभाजित होती है। यहां पर प्रमुख नदियों और उनकी सहायक नदियों का एक जाल बिछा हुआ है। पाकिस्तान की कुछ नदियाँ पश्चिमी पहाड़ों में निकलती हैं, लेकिन दक्षिण एशिया का अधिकांश जल प्रवाह तिब्बत से निकलता है।

ब्रह्मपुत्र नद का उद्गम पश्चिमी तिब्बत में है। तिब्बत में लगभग 2,900 किलोमीटर बहने के बाद, बांग्लादेश में दक्षिण की ओर जाने और बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले यह असामान्य मोड़ लेता है और फिर पश्चिम की ओर मुड़कर भारत में आता है।

सिंधु नदी तिब्बत के न्गारी प्रिफेकचर में मानसरोवर क्षेत्र से निकलती है। इसके तुरंत बाद नदी कश्मीर के लद्दाख जिले में बहती है। इसके बाद उत्तर से पाकिस्तान में प्रवेश करती है। नदी फिर पाकिस्तान की पूरी लंबाई में बहती है और कराची शहर के पास अरब सागर में मिल जाती है। लगभग 3,180 किलोमीटर लंबी यह नदी पाकिस्तान की सबसे लंबी नदी है।

चीन कुल मिलाकर एक शुष्क देश है और कई वर्षों से जल सुरक्षा चीन का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा माना जा रहा है। बांध, सिंचाई प्रणाली और डायवर्सन परियोजनाओं से चीन की न केवल 1.3 अरब आबादी को पीने का पानी सुलभ होता है, बल्कि इससे इसकी आंतरिक राजनीतिक स्थिरता भी महत्वपूर्ण रूप से सुनिश्चित होती है।

सतलुज या तिब्बत में लंगचन खंबब भी तिब्बत में न्गारी से ही निकलती है। इसके बाद न्गारी से ही निकली अपनी बहन नदी सिंधु में मिल जाती है। समुद्र में मिलने से पहले सिंधु नदी पाकिस्तान में एक बहुत ही अलग रास्ता बनाते हुए 1,000 किलोमीटर तक बहती है।

इरावाडी म्यांमार की मुख्य नदी है और देश के अधिकांश हिस्से में जलापूर्ति का स्रोत है। यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि इस विशाल जलमार्ग का स्रोत सीमा के किस तरफ है, क्योंकि यह क्षेत्र अभी भी चीन और बर्मा के बीच विवादास्पद बना हुआ है। हालांकि, इसकी मुख्य सहायक नदी डुलॉन्ग जियांग तिब्बत के पठार पर तिब्बत के उत्तर में चाउ काउंटी से निकलती है और म्यांमार में प्रवेश करने से पहले युन्नान प्रांत से गुजरती है। इरवाड्डी में मिलने से पहले यह अपने उद्गम से बहुत दूर तक नहीं बहती है।

भोटकोसी नदी का अर्थ है ‘तिब्बत से निकली नदी’। यह तिब्बत में प्रसिद्ध माउंट शीशपंगमा के निचले ढलानों से निकलती है, जो नेपाल की एक मुख्य नदी है।

गंगा की सहायक नदियां- भोटकोसी और करनाली नदी- तिब्बत के सुदूर पश्चिम से निकलती हैं।

तिब्बत न केवल दक्षिण एशिया के जल सुरक्षा का केंद्र है बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रीय जल सुरक्षा का भी केंद्र है। मेकांग और यांग्त्से नदियां तिब्बत से ही निकलती हैं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में बदलते वर्षा के पैटर्न के साथ तिब्बती पठार में हिमनदों के पिघलने की गति में वृद्धि से उन लाखों लोगों के लिए जल सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाता है जो जल के लिए तिब्बत में उत्पन्न होने वाली पारवर्ती नदियों पर निर्भर हैं। वर्तमान में तिब्बत में हिमनद पिघलने की वार्षिक दर सात प्रतिशत है, जिसके परिणामस्वरूप 2050 तक इसके दो-तिहाई हिमनद नष्ट हो सकते हैं। पिघलते हिमनद के कारण ब्रह्मपुत्र समेत कुछ नदियों में पानी का बहाव बढ़ गया है। अल्पावधि में नदी के पानी की आपूर्ति बढ़ जाएगी लेकिन यह केवल तब तक चलेगी जब तक कि ग्लेशियर रहेंगे। एशिया इस बात पर भरोसा नहीं कर सकता है कि पानी के बहाव में वृद्ध िलंबे समय तक चलती रहेगी । बारिश के पैटर्न को बदलने से मीठे पानी के स्रोतों में कमी आने की संभावना है।

जलवायु परिवर्तन, एशिया का तेजी से शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि दर दुर्लभ जल संसाधनों पर जबर्दस्त दबाव डाल रहे हैं।

इस प्रकार चीन उपमहाद्वीप सहित एशिया के मुख्य जल संसाधनों के प्रबंधन में एक केंद्रीय भूमिका में बना हुआ है।

चीन कुल मिलाकर एक शुष्क देश है और जल सुरक्षा को कई वर्षों के लिए वहां एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा बनाया गया है। इस प्रकार बांध, सिंचाई प्रणाली और डायवर्सन परियोजनाओं का निर्माण न केवल इसके 1.3 अरब लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आंतरिक राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। चीन के उत्तरी क्षेत्रों में शुष्क जलवायु ने तिब्बती पठार के पानी को चीन के उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों में मोड़ने की आवश्यकता पैदा कर दी है। चीन ने तिब्बत में मेकांग नदी पर सात बांधों का निर्माण किया है और 21 के लिए योजनाएं बना रखी हैं। लगभग छह करोड़ लोग कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड और वियतनाम में भोजन और पानी की सुरक्षा के लिए इस नदी पर निर्भर हैं। इसके प्रवाह में किसी भी तरह का परिवर्तन उनके लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इन खतरों में पर्यावरण शरणार्थियों और जल युद्ध भी शामिल हैं।

यही बात ब्रह्मपुत्र के साथ भी है। चीन ने त्संगपो पर दो और बांधों के निर्माण की योजना बना रखी है। भारत ने त्संगपो नदी पर बांधों के निर्माण का विरोध किया क्योंकि भारत की अपनी जल विद्युत परियोजनाओं पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। जल प्रवाह को मोड़ने की चीन की योजना से भारत और बांग्लादेश में जल प्रवाह, कृषि, पारिस्थितिकी, जीवन और 1.3 अरब लोगों की आजीविका को नुकसान होगा।

लेखक रक्षा और सुरक्षा मामलों के विश्लेषक हैं।

 

 


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