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तिब्बती लोकतंत्र दिवस की पैंसठवीं वर्षगांठ पर कशाग का वक्तव्य

September 2, 2025

आज ०२ सितंबर २०२५ को तिब्बती लोकतंत्र की स्थापना की ६५वीं वर्षगांठ और परम पावन महान १४वें दलाई लामा के ९०वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में दुनिया भर में मनाए जा रहे ‘करुणा वर्ष’ के महत्वपूर्ण अवसर पर कशाग सभी विशिष्ट अतिथियों, तिब्बती लोगों और अपने–अपने क्षेत्रों में उत्सव मना रहे सभी लोगों को हार्दिक बधाई देता है।

परम पावन १४वें दलाई लामा बहुत कम उम्र से ही लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले आध्यात्मिक हस्ती रहे हैं। हालांकि तिब्बत में सामाजिक सुधारों के उनके प्रयास पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) की सरकार द्वारा व्यवस्थित बाधाओं के कारण साकार नहीं हो सके। परम पावन ने भारत आगमन के तुरंत बाद २९ अप्रैल १९५९ को मसूरी में निर्वासित तिब्बत सरकार का प्रशासन स्थापित किया। ०३ फरवरी १९६० को तिब्बत के तीन पारंपरिक प्रांतों के प्रमुख धर्मगुरुओं और जनसाधारण के प्रतिनिधियों ने स्वेच्छा से एकजुट होकर महाशपथ (ना गान थुमोछे) ली और परम पावन के मार्गदर्शन में उनके परामर्श को पूर्ण करने का वचन दिया। इसके बाद परम पावन ने तीनों पारंपरिक प्रांतों और तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदायों के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक निर्वाचित निकाय के गठन की सलाह दी। तदनुसार, ०२ सितंबर १९६० को तिब्बती जन प्रतिनिधियों के पहले आयोग ने शपथ ली, जिसने तिब्बती संघर्ष के समाधान और निर्वासित तिब्बती लोगों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए समर्पित एक प्रशासन की नींव रखी। इस प्रकार, तिब्बती लोकतंत्र दिवस तिब्बती लोगों के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

पिछले ६५ वर्षों में निर्वासित तिब्बती समाज में लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकास

तिब्बती जन प्रतिनिधियों के आयोग (जिसे बाद में तिब्बती जन प्रतिनिधियों की सभा का नाम दिया गया) और प्रशासन में १९६० से १९९० तक क्रमिक सुधार किए गए, जो मुख्यतः ‘तिब्बत के निर्माणाधीन संविधान’ के अनुरूप थे। अर्ध–वार्षिक और वार्षिक आम बैठकों में केंद्रीय और क्षेत्रीय तिब्बती प्रशासनों के प्रतिनिधियों की व्यापक भागीदारी द्वारा लोकतंत्र–आधारित व्यवस्था की शुरुआत की गई। १९९१ में निर्वासित तिब्बतियों का चार्टर लागू किया गया, जिसमें लोकतंत्र के तीन अंगों और तीन स्वायत्त निकायों को शामिल करते हुए एक पूर्ण लोकतांत्रिक ढांचा स्थापित किया गया। परम पावन १४वें दलाई लामा के निर्देशन में चार्टर में आवश्यक प्रावधान किए गए, जिसके परिणामस्वरूप २००१ में तिब्बती लोगों द्वारा कालोन त्रिपा का प्रत्यक्ष चुनाव हुआ। २०११ में परम पावन ने अपने सभी राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेताओं को सौंप दिए। इन चार चरणों में निर्वासित तिब्बती समाज में लोकतांत्रिक प्रणाली को समेकित और मजबूत किया गया, जो पूरी तरह से परम पावन के दूरदर्शी नेतृत्व और ऊपर से नीचे तक के क्रमिक व्यवस्थित ढांचे के लिए उनके आशीर्वाद से संभव हो पाया।

लगभग तीस देशों में फैले निर्वासित तिब्बती समुदाय में एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रशासन की सफल स्थापना और कार्यान्वयन दुनिया के विभिन्न निर्वासित समुदायों से अनूठी और उनके लिए प्रेरणास्रोत है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि यह उपलब्धि परम पावन १४वें दलाई लामा के उदार नेतृत्व से ही संभव हुई है। हालांकि, निर्वासित तिब्बती समुदाय के लोकतांत्रिक व्यवस्था में समयबद्ध सुधारों की आवश्यकता है और अभी भी कई चुनौतियों का समाधान किया जाना बाकी है।

कशाग ने १७वीं निर्वासित तिब्बती संसद के पांचवें सत्र के प्रस्ताव के अनुसार गठित ‘नियम एवं विनियम समीक्षा समिति’ के समक्ष चार्टर संशोधनों का एक मसौदा पेश किया। प्रस्ताव में न केवल तिब्बती जनता में प्रचलित आमराय और उससे उत्पन्न संकट को प्रतिबिंबित किया गया, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करते हुए परिस्थितिजन्य चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से संशोधन का प्रस्ताव भी रखा गया। प्रस्ताव के दूसरे उपखंड में आगामी दलाई लामाओं द्वारा अंतर्निहित अधिकार ग्रहण करने से संबंधित चार्टर के अनुच्छेद–१ में संशोधन के अलावा सलाह और मार्गदर्शन संबंधित संशोधन शामिल किए गए। हालांकि इस अनुच्छेद में प्रस्तावित परिवर्तनों में संशोधन कर दिया गया है, फिर भी अन्य आवश्यक बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना बाकी है। आशा है कि भविष्य में सभी द्वारा इसकी सावधानीपूर्वक समीक्षा की जाएगी।

तिब्बती संसद के आठवें सत्र के आधिकारिक वक्तव्य में कशाग ने चार्टर में निहित मेजबान देश के कानूनों का पालन करने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि परम पावन दलाई लामा और लगभग अस्सी हज़ार निर्वासित तिब्बतियों के भारत, नेपाल और भूटान में निर्वासन में रहने के बाद के पैंसठ वर्षों में मेजबान देशों और तिब्बती निर्वासित समुदाय दोनों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इसमें कानूनी ढांचे और नीति कार्यान्वयन तंत्र भी साथ–साथ विकसित हुए हैं। अतः तिब्बती चार्टर के अनुच्छेद–६ के अनुसार, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के सभी कार्यों को मेजबान देश के कानूनों की गहन समझ के साथ करना होगा। कानूनी अनुपालन और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए समय पर नियामक संशोधन अनिवार्य हैं। वक्तव्य में इन घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि, मौजूदा कानूनी स्थिति, नियामक प्रश्नों और मौजूदा चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। इसी प्रकार, सीटीए के बजट नियमों में संशोधन करने वाला एक मसौदा विधेयक संसद के नौवें सत्र में प्रस्तुत किया गया और तत्पश्चात एक समीक्षा समिति का गठन किया गया। आशा है कि आगामी संसदीय सत्र में इस विधेयक की समीक्षा और समर्थन हो जाएगा।

परम पावन दलाई लामा के ९०वें जन्मदिवस समारोह के उपलक्ष्य में कशाग ने १५वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन का आयोजन किया और सभी देवी–देवताओं तथा हिमभूमि के लोगों की ओर से परम पावन की दीर्घायु की कामना की। आधिकारिक जन्मदिवस समारोह में तिब्बती बौद्ध परंपराओं के प्रतिष्ठित प्रमुख और दूत, तिब्बती बौद्ध धर्म के तीनों लोकतांत्रिक निकायों की गणमान्य हस्ती, भारत की केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री और प्रतिनिधि सहित दुनिया भर के विशिष्ट अतिथि और सैकड़ों कलाकार शामिल हुए। इस दौरान ‘करुणा वर्ष’ का आधिकारिक रूप से शुभारंभ किया गया। इस समारोह को लगभग २१६ मीडिया संस्थानों ने कवर किया और वृत्तचित्रों और विश्लेषणात्मक लेखों के द्वारा परम पावन के महान योगदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया और उनके नेतृत्व और आकांक्षाओं के प्रति वैश्विक श्रद्धा और समर्थन को सामने लाया। इसने तिब्बत की राजनीतिक स्थिति के महत्व पर व्यापक चर्चा को और सुगम बनाया।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने परम पावन १४वें दलाई लामा के ९०वें जन्मदिन (०६ जुलाई २०२५) से ०५ जुलाई २०२६ तक की अवधि को विश्व स्तर पर ‘करुणा वर्ष’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। कशाग तिब्बती लोगों और तिब्बत समर्थकों से अपील करता है कि वे अपने–अपने और आसपास के इलाकों में परम पावन की करुणा के सिद्धांत से उत्पन्न चार प्रमुख प्रतिबद्धताओं के बारे में जागरुकता अभियान चलाएं। साथ ही,  हम विभिन्न इलाकों में पहले से चल रही विविध और विचारशील पहलों की सराहना करते हैं। ऐसी पहलों के लिए तस्वीरों जैसे किसी भी जरूरी दस्तावेज को सीटीए की आधिकारिक घोटन (९०वें जन्मदिन समारोह) वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है या घोटन आयोजन समिति से प्राप्त किया जा सकता है।

०२ जुलाई २०२५ को परम पावन दलाई लामा ने असीम करुणा के साथ दलाई लामा संस्था की निरंतरता की पुष्टि की। उसी दिन १५वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में उपस्थित सभी तिब्बती बौद्ध परंपराओं के प्रमुखों और आचार्यों ने अन्य सभी प्रतिभागियों के साथ मिलकर परम पावन महान १४वें दलाई लामा के प्रति हार्दिक कृतज्ञता का त्रि–सूत्रीय प्रस्ताव सर्वसम्मति से अपनाया। प्रस्ताव में कहा गया कि १५वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन के सभी प्रतिभागियों ने एकमत होकर परम पावन दलाई लामा के पवित्र वक्तव्य का समर्थन किया। इसने पुष्टि की कि परम पावन दलाई लामा के पुनर्जन्मों को मान्यता देने की प्रक्रिया तिब्बती बौद्ध धर्म की अनूठी और पवित्र परंपराओं में निहित है और किसी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को दृढ़ता से अस्वीकार किया जाता है। इसने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा धार्मिक प्रथा का राजनीतिकरण करने के किसी भी प्रयास की भी निंदा की है। ०४ जुलाई को दूसरा चार–सूत्रीय प्रस्ताव अपनाया गया। इसमें कहा गया है कि परम पावन दलाई लामा के पुनर्जन्मों को मान्यता देने की प्रक्रिया के लिए जिम्मेदारी और अधिकार को सुनिश्चित करने के साथ सभी प्रतिभागियों और उनके अनुयायियों ने अटूट विश्वास के साथ इस पवित्र विरासत को जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध होने की शपथ ली है। इस प्रकार चीन में परम पावन के पुनर्जन्म की खोज, तथाकथित ‘स्वर्ण कलश लॉटरी’ प्रणाली या चीन की ‘केंद्र सरकार की स्वीकृति’ की आवश्यकता जैसे पीआरसी सरकार के भ्रामक प्रचार को जड़ से ही उखाड़ फेंका गया है।

तिब्बत पर कब्जा कर लेने के बाद चीन की सरकार ने तिब्बती बौद्ध धर्म के उन्मूलन के लिए सुनियोजित अभियान चलाया, जिसमें ६००० से ज्‍यादा मठों को नष्ट कर दिया गया, भिक्षुओं और भिक्षुणियों के चीवर जबरन उतरवा लिये गए और अनुमानित १२ लाख तिब्बतियों की हत्या कर दी गई। आज तथाकथित ‘चीनी राष्ट्रीय चेतना’ गढ़ने के लिए तिब्बतियों को अपनी पहचान त्यागने के लिए मजबूर किया जा रहा है। तिब्बती बौद्ध धर्म के सरकार निर्देशित ‘चीनीकरण’ नीति के तहत मठों में भिक्षुओं और भिक्षुणियों की संख्या सीमित कर दी गई है, जबकि मठों का स्वामित्व और आय जब्त कर ली गई है। मठों के प्रशासन का प्रबंधन करने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों, सरकारी अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया है। भिक्षुओं और भिक्षुणियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्हें तिब्बती बौद्ध धर्म के अध्ययन और साधना से भी वंचित किया गया है। अब उन्हें कम्युनिस्ट विचारधारा में दीक्षित किया जा रहा है। महंथों, लामाओं और गेशे जैसे धार्मिक व्यक्तियों को जबरन राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। तिब्बती बौद्ध धर्म के इतिहास में चीन की कम्युनिस्ट सरकार से ज्‍यादा किसी भी ताकत ने बौद्ध धर्म को अपने लिए इतना बड़ा खतरा नहीं बनाया। चीन के पास इतिहास, नैतिकता या किसी भी कानून-व्यवस्था के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार जाकर परम पावन के पुनर्जन्मों को मंज़ूरी देने का कोई वैध अधिकार नहीं है।

तीस साल पहले बीजिंग ने ११वें पंचेन लामा, जेत्सुन तेनजिन गेधुन येशी त्रिनले फुंत्सोक पाल सांगपो का छह साल की उम्र में जबरन अपहरण कर लिया था। आज तक, उनकी कुशल–क्षेम और ठिकाना अज्ञात है। चीन सरकार ने सार्वजनिक समारोह का ढोंग कर तथाकथित ‘स्वर्ण कलश लॉटरी’ के जरिए ग्यालत्सेन नोरबू को ११वें पंचेन लामा के पद पर बिठाया और तब से उन्हें सरकारी प्रचार के लिए इस्तेमाल कर रही है। तिब्बतियों को उनके दर्शन करने और उनकी शिक्षाओं में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे माहौल में जहां बौद्ध धर्म की सेवा करने का वास्तविक अवसर नहीं मिल पाता, पुनर्जन्म का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

एक बात हम पूरी स्पष्टता से कह सकते हैं कि परम पावन महान १४वें दलाई लामा निस्संदेह दीर्घायु होंगे और अपनी चार प्रमुख प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के अपने नेक प्रयास को जारी रखेंगे। परम पावन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक चीन–तिब्बत संघर्ष का सार्थक समाधान नहीं हो जाता, तब तक दलाई लामाओं का पुनर्जन्म किसी स्वतंत्र देश में होगा। परम पावन के पुनर्जन्म की खोज, मान्यता और उन्हें सिंहासनारूढ़ करने की जिम्मेदारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट की होगी। ट्रस्ट तिब्बती बौद्ध परंपराओं के पूजनीय प्रमुखों और शपथ–बद्ध धर्म रक्षकों के परामर्श से पुनर्जन्म को मान्यता देने की स्थापित परंपरा के अनुरूप उनकी ही खोज को मान्यता प्रदान करेगा। परम पावन दलाई लामा के पुनर्जन्मों द्वारा तिब्बती लोगों का नेतृत्व करने की पवित्र प्रतिबद्धता जुड़ी हुई है। इसलिए पीआरसी सरकार द्वारा प्रचारित कोई भी भ्रामक मनगढ़ंत कहानी अंतरराष्ट्रीय बौद्ध समुदाय, तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों और साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष निष्फल हो जाएगी।

परम पावन दलाई लामा के ९०वें जन्मदिन पर अनेक पूर्व और वर्तमान शासनाध्यक्षों और गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी शुभकामनाएं दीं। इसके अलावा, यूनाइटेड किंगडम (इंग्लैंड), फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, लिथुआनिया, रोडियाम और आइसलैंड के मानवाधिकार के दूतों ने परम पावन १४वें दलाई लामा के जन्मदिन के सम्मान में एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें धर्म या आस्था की स्वतंत्रता के अधिकार और राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त धार्मिक नेताओं को चुनने के अधिकार को ही दोहराया गया। २७ जुलाई को चेक गणराज्य के राष्ट्रपति महामहिम पेट्र पावल ने लद्दाख की ऐतिहासिक यात्रा में परम पावन दलाई लामा से मुलाकात की। चेक गणराज्य एक ऐसा देश है, जिसके साथ परम पावन के संबंध लंबे समय से हैं। कशाग, तिब्बती समुदाय, तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों, व्यापक बौद्ध समुदाय और बौद्ध राष्ट्रों द्वारा परम पावन के पुनर्जन्म से संबंधित प्रस्तावों, घोषणाओं और अपीलों के सहायक दस्तावेजों को संकलित किया जा रहा है। हम तिब्बत मुक्ति की साधना में स्वतंत्र राष्ट्रों से प्राप्त समर्थन को निष्ठापूर्वक स्वीकार करेंगे और सभी के सामूहिक प्रयासों को और आगे बढ़ाएंगे।

तिब्बत मुक्ति साधना में लोकतांत्रिक सिद्धांत अदम्य शक्ति बने हुए हैं और हमारे पुनर्मिलन पर तिब्बतियों के लिए सबसे अनमोल उपहार के रूप में खड़े हैं। न्याय के लिए कशाग का दृष्टिकोण एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के न्यायसंगत कानूनी ढांचे और समतामूलक नीतियों के माध्यम से भी साकार हो सकता है। हम आशा करते हैं कि तिब्बती जनता अपनी सक्रिय राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ेगी। आइए, हम अपनी सामूहिक आकांक्षाओं को साकार करने के लिए अपने साझा संकल्प का आह्वान करते हैं।

अंत में, हम तिब्बत के परम पावन महान १४वें दलाई लामा की दीर्घायु और उनके पुण्य कार्यों की निरंतरता के लिए प्रार्थना करते हैं। तिब्बत के अंदर और निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के बलिदानों के साथ स्वतंत्रता और लोकतंत्र की धुन तेजी से गूंजती रहे।

– कशाग
०२ सितंबर २०२५

यह कशाग के मूल तिब्बती वक्तव्य का हिन्दी अनुवाद है। किसी भी प्रकार का अंतर आने की स्थिति में मूल तिब्बती संस्करण को ही आधिकारिक तौर पर अंतिम माना जाएगा।


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