
थेकचेन चोलिंग, धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश, भारत। परम पावन दलाई लामा के दीर्घायु के लिए प्रार्थना करने हेतु आयोजित समारोहों की शृंखला में २५ मार्च की सुबह मुख्य तिब्बती मंदिर ‘सुगलाखंग’ और उसके सामने का प्रांगण फूलों से भव्य रूप से सजाया गया था। इस अवसर पर परम पावन के लगभग ४००० अनुयायी उपस्थित थे।
जब परम पावन अपने आवास से निकलकर द्वार पर आए, तो प्रार्थनाएं अर्पित करने वाले तीन समूहों के प्रतिनिधियों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। इन समूहों में सेंट्रल तिब्बत के लोगों का संघ, खाम के जाचुक क्षेत्र के लोगों का संघ और क्यिरोंग के लोगों का संघ शामिल था। तत्पश्चात, सींग (हॉर्न) बजाते और धूपदान झुलाते भिक्षुओं के नेतृत्व में तीनों संघों के भिक्षु परम पावन को मंदिर तक ले गए। मंदिर के प्रांगण में नर्तकों ने उल्लासपूर्वक गीत गाए और नृत्य किया।
लिंग रिनपोछे ने समारोह की अध्यक्षता की, जो ‘श्वेत तारा के इच्छा-पूर्ति चक्र’ पर आधारित था। उनके दाईं ओर नामग्याल मठ के महंथ विराजमान हुए तथा बाईं ओर तुलशुक रिनपोछे और नामग्याल मठ के दोर्जे लोपोन आसीन हुए। सिंहासन की बाईं ओर उपस्थित अतिथियों में गान्देन जांगत्से और ग्युतो मठों के पूर्व महंथ भी शामिल थे।
जटिल दृश्यों के वर्णनों के बीच-बीच में एक छंद दोहराई जा रही थी:
आपसे यही मनोकामना है कि आप हमारे गौरवशाली, पवित्र लामा के जीवन को युगों-युगों तक बनाएं रखें।
कृपया उन्हें अमरता की आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करें।
इसके बाद, लामा की दीर्घायु प्राप्त कराने के लिए अतीत के आध्यात्मिक गुरुओं की प्रार्थना की गईं।
इसके बाद लिंग रिनपोछे आगे आए और परम पावन को ‘दीर्घ-जीवन वाण’ भेंट किया, परम पावन ने उसे ग्रहण किया और धीरे-धीरे उसे सभी दिशाओं में घुमाया। तब भगवान अमिताभ का आह्वान किया गया। इसके बाद एक ऐसी डोरी वितरित की गई, जो अनुष्ठान कर रहे लामाओं को परम पावन से जोड़ती थी। इसके साथ ही रंगीन प्रकाश के तंबू प्रकट किए गए।
मंत्र-गुरु ने ‘मंडल अर्पण’ पाठ का नेतृत्व किया, जिसमें लामा से शिक्षाओं और सभी जीवों के कल्याण के लिए १०० युगों तक जीवित रहने का अनुरोध किया गया। इस अनुरोध को और पुष्ट करते हुए लिंग रिनपोछे ने प्रार्थना की, ‘हे परम पावन, हमारी मनोकामना है कि आप १०० युगों तक जीवित रहें, ताकि हम पुण्य और प्रज्ञा अर्जित करते रहें।’ उन्होंने एक मंडल भी अर्पित किया। इसके बाद आर्य तारा की एक प्रतिमा, एक धर्मग्रंथ और एक स्तूप भेंट किया गया। ये तीनों प्रबुद्ध सत्पुरुषों के मन, वचन और कर्म के प्रतीक रूप हैं। इसके बाद, उन्होंने पांच बुद्ध-वंशों के प्रतीकों, दीर्घ-जीवन प्रदान करने वाली मदिरा, दीर्घायु गोलियां, सात राजसी प्रतीक, आठ शुभ चिह्न और आठ शुभ पदार्थों का अर्पण किया।
जब परम पावन के दो गुरुओं द्वारा उनके दीर्घ-जीवन के लिए प्रार्थना का पाठ किया जा रहा था, तब आज के समारोह का आयोजन करने वाले विभिन्न समूहों के प्रतिनिधि, परम पावन का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके पट्ट आसन के समीप पहुंचे।
सेंट्रल तिब्बत के लोगों के संघ ने परम पावन को एक प्रतीक भेंट किया, जिसे उन्होंने ‘विश्व शरणार्थी पुरस्कार (वर्ल्ड्स रिफ्यूज अवार्ड)’ नाम दिया। उनके समूह के एक सदस्य ने इस प्रतीक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाली चीज के बारे में पढ़कर सुनाया:-
‘यह पुरस्कार सर्वोत्तम कांसे से बनाया गया है। इसका गोलाकार स्वरूप परम पावन की प्रेम, करुणा और सदाचार की विश्वव्यापी गतिविधियों का प्रतीक है, जो दुनिया के लिए एक दीप्तिमान प्रकाश के समान हैं। इसके केंद्र में स्थित पोटाला महल तिब्बती राष्ट्र के लंबे और गौरवशाली इतिहास का तथा इस जीवन और उसके बाद भी तिब्बती लोगों के लिए परम पावन के ‘सर्वोच्च शरण’ वाली भूमिका का प्रतिनिधित्व करता है। परम पावन की विशिष्ट करुणापूर्ण मुस्कान, तिब्बती लोगों की उस हार्दिक आशा को व्यक्त करती है कि वे शीघ्र ही और आनन्द के साथ पोटाला लौटेंगे तथा पूरे विश्व में प्रेम और करुणा के बीज वपन करेंगे।
‘उनके सिर के पीछे से बिखरती आभा किरणें उनकी सर्वव्यापी करुणा को प्रकाशित करती हैं, जो संपूर्ण विश्व को शांति और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करती है। तीन बादल उनकी तीन प्रतिज्ञाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आकाश से गिरते फूलों की भांति दुनिया पर अपना आशीर्वाद बरसाते हैं और समस्त प्राणियों पर प्रेम तथा करुणा की अविरल वर्षा करते हैं।
‘इसके पिछले भाग पर बना विश्व का मानचित्र परम पावन की ‘विश्वव्यापी उत्तरदायित्व’ की दृष्टि, मानवता की एकता, परस्पर-निर्भरता के दृष्टिकोण, तथा उनके शांति और अहिंसा के आचरण का प्रतीक है। तिब्बत का मानचित्र, तिब्बती लोगों की अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रूप से संरक्षित रखने के प्रति उनके संकल्प को दर्शाता है। परम पावन के ९०वें वर्ष, तथा ‘प्रेम और करुणा वर्ष’ के प्रतीक-चिह्न, उनकी उन बाह्य, आंतरिक और गोपनीय गतिविधियों की विशालता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने विश्व में करुणा के मूल्य को गरिमा प्रदान की है।’
अवॉर्ड के चारो ओर से घेरे हुई पर्वतमाला तिब्बत के धर्म, राजनीति और संस्कृति की रक्षा करने में परम पावन की अतुलनीय करुणा को दर्शाती है। अवॉर्ड के नीचे से कर्णधार बने दो हिम-सिंह तिब्बत के धर्म, राजनीति और संस्कृति को संरक्षित करने की परम पावन की अतुलनीय विरासत के प्रति समस्त तिब्बती लोगों की प्रशंसा और श्रद्धा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
‘पाद पीठ पर तिब्बती और अंग्रेजी में उत्कीर्ण शिलालेख उद्घोषणा करता है कि परम पावन पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के अतुलनीय आश्रय और रक्षक हैं। अवॉर्ड फलक के ठीक केंद्र में स्थित ‘दोहरी अनंत गांठ’ केंद्रीय तिब्बत का प्रतीक है और धर्म और शासन के मिलन का प्रतिनिधित्व करती है। इसके पिछले भाग पर अंकित छह-अक्षरों वाला मंत्र ‘ओम मणि पद्मे हम’ तिब्बती लोगों की अद्वितीय आस्था को प्रकाशित करता है। कामना है कि परम पावन सदैव दृढ़ और अडिग बने रहें।’
दोखाम जाचुका के लोगों के संघ ने भी परम पावन को एक विशेष स्मृति-चिह्न भेंट किया और उनके एक सदस्य ने इसके साथ संलग्न एक वक्तव्य पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने यह आशा व्यक्त की कि तिब्बत के लोग एक बार पुनः एकजुट हो सकेंगे। दोखाम जाचुका के लोगों ने परम पावन का अनुसरण करने का संकल्प लिया, जो कि ‘पद्मपाणि (हस्त कमल)’ और ‘रत्न कल्प’ के समान हैं। उन्होंने इस आशा को पुनः दोहराया कि वे सभी एक बार फिर ल्हासा में मिल सकेंगे।
इसके बाद परम पावन द्वारा दीर्घायु रहने के अनुरोध को स्वीकार करने के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन स्वरूप एक ‘मंडल’ तथा बुद्धों के मन, वचन और कर्म का प्रतीक अर्पित किया गया।
आज के समारोह का समापन, ‘सत्य वचन’ सहित अन्य शुभ प्रार्थनाओं के साथ हुआ। भिक्षुओं द्वारा सींग बजाते हुए, धूपदान लहराते हुए तथा आज के संरक्षकों के प्रतिनिधियों द्वारा मार्ग दिखाने पर उनका अनुसरण करते हुए परम पावन ने मंदिर से प्रस्थान किया। जब वे लिफ्ट के समीप पहुंचे, तो उनका एक छोटे बालक के साथ अत्यंत मनमोहक संवाद हुआ; जब परम पावन ने उसे संकेत से बुलाया, तो वह उछलकर आगे की ओर दौड़ पड़ा। परम पावन द्वारा सिर पर हाथ फेरे जाने के पश्चात्, उस छोटे बालक ने हाथ हिलाया और तत्क्षण ही अपने हाथों को प्रार्थना की मुद्रा में जोड़ लिया, जिससे परम पावन को अत्यंत आनंद और कौतुक का अनुभव हुआ। अपने निवास-स्थान की ओर लौटते समय भी वे अपने दाईं और बाईं ओर खड़े शुभचिंतकों को देखकर निरंतर मुस्कुराते रहे।








